KINDNESS KITCHEN: जरूरतमंदो की थाली भर रहा अश्वंथ का कम्युनिटी किचन, दयालुता की अदभुत कहानी!

Highlights-

  •  कमयूनिटि किचन किफायती भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास करता है।
  •  दादी की स्मृति को पंकजम चैरिटी ट्रस्ट के साथ आगे बढ़ाया जाएगा।

नेकी और दयालुता लहर प्रभाव पैदा कर सकता है, और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। दयालुता के कार्य करने से जीवन और अधिक सार्थक महसूस होने लगता है। द भाई फ्रेंड रेस्तरां के मालिक अश्वंथ कुमार अपनी दादी पंकजम स्वामीनाथन को उनवेल्यूज़ को स्थापित करने का क्रेडिट देते हैं, जिसके कारण उन्होंने जरूरतमंद और मजदूर वर्ग के लिए अपनी नई कम्यूनिटि किचन स्थापित की।

दादी से मिली प्रेरणा

एक इंटरव्यू मे अश्वंथ अपनी कहानी साझा करते हुए कहते है- “जब मेरे पिता 10 वर्ष के थे, तब मेरे दादाजी का निधन हो गया और मेरी दादी ने बहुत संघर्ष किया। जब मैं बच्चा था, तो मैं देखता था कि मेरी दादी एक ऑटोरिक्शा चालक को20 रुपये की जगह50 रुपये देती थी, सिर्फ उसके चेहरे पर एक मुस्कान देखने के लिए।

यह उनका स्वभाव था, जिसने मुझे प्रेरित किया है और मुझे सब कुछ सिखाया है। वह आगे बताते हैं कि उन्होंने अपनी दादी को 6 महीने पहले खो दिया था, लेकिन उनकी स्मृति को अभी भी पंकजम चैरिटी ट्रस्ट के साथ आगे बढ़ाया जाएगा।इस ट्रस्ट का उद्घाटन हाल ही में किया गया है।

क्या है कमयूनिटि किचन?

कमयूनिटि किचन किफायती भोजन उपलब्ध कराने का प्रयास करता है। साथ हींजरूरतमंदों और विकलांग व्यक्तियों के लिए, यहासेवा निःशुल्क होती है।
अश्वंथमुस्कुरातेहुए कहते है- “हमने इसे सस्ती कीमतों पर रखा है और उन लोगों के लिए मुफ्त है जो इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते क्योंकि हम चाहते हैं कि हर कोई आए और बिना किसी झिझक के भोजन का आनंद उठाए,”। नाश्ता और दोपहर का भोजन 10 रुपये से 20 रुपये और पूरे भोजन की कीमत 20 रुपये रखी गयी है।

कोविड लॉक्डाउन मे भी की मदद

अश्वंथ और उनकी टीम ने महामारी में बिगड़ती वास्तविकताओं से कई बार लोगों को जूझते देखा है। उन्होंने दो कुक और एक डिलीवरी पर्सन के साथ, लगभग 600-700 लोगों की सेवा की है जो पिछले दो वर्षों से बेघर, जरूरतमंद या 

कोविड से जुझ रहे थे

अश्वंथ कहते है- “महामारी ने सभी को प्रभावित किया है। शुरू में, हमने केवल अपने घर के आसपास जरूरतमंदों की सेवा करना शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे हमारा काम पूरे चेन्नई में फैल गया।

धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए

शुरुआती दिनों में उन्हें, फंडिंग कि समस्याओं का सामना करना पढ़ा। वह अपनी सेविंगस् से ही पूरा खर्चा किया करते थे। लेकिन उनके काम की प्रकृति ने अधिक समान विचारधारा वाले लोगों को भी आकर्षित किया जिन्होंने उनकेइस मिशन मे समर्थन किया।
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Dr. Kirti Sisodhia

Content Writer

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