कभी खुद की पढ़ाई के लिए नहीं थे पैसे, आज 40 हजार बच्चों के पढ़ने-खाने और रहने का उठा रहे हैं खर्च

Inspiration: आज से करीब 30 साल पहले भुवनेश्वर में अच्युता सामंत ने 12 बच्चों और 2 स्टाफ के साथ एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूट की नींव रखी, उद्देश्य था हर वर्ग के बच्चों तक अच्छी शिक्षा पहुंचाना। आज ये संस्थान बड़े एजुकेशनल संस्थान के रूप में विदेशों में भी पहचान रखता है। हम बात कर रहे हैं कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी के बारे में। यह संस्थान बच्चों को जॉब के लायक बनाने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। इसके संस्थापक डॉ अच्युता सामंत 40,000 बच्चों को इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग और वोकेशनल स्टडीज के साथ सोशल साइंस की पढ़ाई करने में मदद कर चुके हैं और लगभग 40 हजार बच्चे अभी भी पढ़ रहे हैं। फिलहाल यह दुनिया की पहली ट्राइबल यूनिवर्सिटी के रूप में स्थापित है, जिसमें करीब 40,000 बच्चे सोशल साइंसेज में पढ़ाई कर रहे हैं।
 

नक्सल प्रभावित बच्चों को नि शुल्क शिक्षा के साथ रहने खाने की व्यवस्था

डॉ अच्युता सामंत की कोशिशों से प्रभावित इलाकों के आदिवासी बच्चों को अपने यहां रहने-खाने की फ्री व्यवस्था मिल रही है। यहां बच्चे नर्सरी से पीजी तक की पढ़ाई कराते हैं। दिन भर जंगल में भटकने वाले आदिवासी बच्चे अब अपनी आंखों में बेहतर भविष्य का सपना लेकर भुवनेश्वर के इस रेजीडेंशियल स्कूल तक पहुंच रहे हैं।
 
दिलचस्प बात यह है कि इस इंस्टिट्यूट में पढ़ाई करने वाले बच्चों में से काफी बच्चे नीट और जेईई जैसी इंजीनियरिंग की परीक्षा पास कर चुके हैं। उड़ीसा एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज और इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज की परीक्षा तक यहां के बच्चे पास कर चुके हैं। गरीबी की वजह से स्कूल जाने के बारे में जो बच्चे कभी सोच तक नहीं पाते थे आज उनका जीवन बदल चुका है। इस इंस्टिट्यूट में शिक्षा के साथ मेडिकल और फ्री लाइब्रेरी की सुविधा भी दी जा रही है।
 

संस्थापक के पास कभी नहीं थे खुद की पढ़ाई के पैसे

डॉ अच्युता सामंत का बचपन काफी गरीबी में बीता, वे इतने गरीब थे कि उनके पास पढ़ाई करने के लिए कोई साधन नहीं थी। डॉ सामंत कहते हैं कि अपनी अभाव और अपनी मजबूरी को देखते हुए उन्होंने अपने आसपास के बच्चों को उस अभाव से बाहर निकलने के बारे में सोचा।
 

5000 रुपए से शुरू हुआ था संस्थान

आज विदेशों तक अपनी पहचान स्थापित कर चुका डॉ सामंत के संस्थान की शुरूआत कभी सिर्फ 5000 की पूंजी से हुई थी। वोकेशनल ट्रेनिंग उस समय युवाओं की जरूरत थी और युवाओं को जॉब उपलब्ध कराने के लिहाज से डॉ सामंत ने कलिंगा इंस्टिट्यूट की नींव रखी थी।
 

40 हजार बच्चों की पढ़ाई और रहने खाने का खर्च उठा चुका है संस्थान

कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में अब तक 40,000 बच्चे पढ़ाई कर प्रोफेशनल लाइफ में कुछ अच्छा कर रहे हैं। जबकि इस समय लगभग 40,000 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में बच्चों को रखने पर डॉक्टर सामंत का सालाना खर्च 120 करोड़ रुपए के आस-पास का है। जिसके लिए कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग से करीब ₹80-90 करोड़ की कमाई का इस्तेमाल होता है, वहीं पूर्व छात्रों के योगदान और केंद्र व राज्य सरकारों की मदद से इस संस्थान को मिलती है।
 
 
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Dr. Kirti Sisodhia

Content Writer

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