KEDARNATH TEMPLE: 6 मई से होंगे भगवान शिव के दर्शन, खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट!

HIGHLIGHTS:

  • 6 मई को खुलेंगे केदारनाथ धाम के कपाट
  • 8 मई को खुलेंगे बद्रीनाथ धाम के कपाट
  • कपाट खुलने की तारीख घोषित होते ही उत्तराखंड चारधाम यात्रा 2022 की तैयारियां शुरू

Kedarnath Dham: केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव के दर्शन 6 मई से शुरू होंगे इसके लिए केदारनाथ धाम के कपाट सुबह 6.25 बजे खुलेंगे। साथ ही बद्रीनाथ मंदिर भी 8 मई से खुलेगा। 12 ज्योतिर्लिंगों में विशेष केदारनाथ मंदिर पौराणिक है। ऐसी मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग का निर्माण पांडवों ने महाभारत के युद्ध समाप्त होने के बाद करावाया था।
केदारनाथ धाम के कपाट खोलने की तिथि महाशिवरात्रि पर शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में रावल भीमाशंकर की मौजूदगी में पंचांग की गणना से की गई है।

8 मई को खुलेंगे बदरीनाथ धाम के कपाट

बदरीनाथ धाम के कपाट रविवार 8 मई को सुबह 6 बजकर 15 मिनट में खुल जाएंगे। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तारीख घोषित होते ही उत्तराखंड चारधाम यात्रा 2022 की तैयारियां शुरू हो गई हैं। दरअसल बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने और बंद होने की एक विशेष प्रकिया है। जिसमें बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि बसंत पंचमी पर टिहरी जनपद के नरेंद्रनगर स्थित राजदरबार में तय की जाती है।

पैराणिक है केदारनाथ धाम मंदिर

उत्तराखंड में गिरिराज हिमालय में केदार नाम की चोटी पर स्थित केदारनाथ मंदिर आस्था का प्रतीक है। 12 ज्योतिर्लिंगों में एक केदारेश्वर महादेव पौराणिक हैं। यह शिव मंदिर चार धामों में से एक धाम भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार केदारनाथ की कथा महाभारत से जुड़ी है। ऐसी मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडव भगवान शिव को खोजते हुए काशी की यात्रा करते हैं। पांडवों का मानना था कि युद्ध से पैदा हुए सभी पापों से मुक्ति उन्हें तभी मिलेगी जब वे भगवान शिव के दर्शन करेंगे। जब भगवान शिव ने यह जाना तो वे एक बैल का रूप धारण कर उत्तराखंड में छिप गए। भगवान शिव जिस जगह पर छुपे थे वहां आज गुप्तकाशी है। जब पांडव काशी से होते हुए उत्तराखंड पहुंचे और वहां भीम ने किसी तरह भगवान शिव को ढूंढा और उन्हें भगवान शिव के दर्शन हुए। इसमें एक दिलचस्प बात ये भी है कि भगवान शिव बैल बनकर जमीन के अंदर छिपे थे, लेकिन उनकी पूँछ और उनका कूबड़ बाहर दिख रहा था। भीम ने जब पूँछ को पकड़कर बैल को निकालने की कोशिश की तो ऐसे में उसका सिर नेपाल डोलेश्वर महादेव में जाकर गिर गया और कूबड़ एक शिवलिंग के रूप में स्थापित हुआ। इसी समय पहाड़ के दो हिस्से भी हुए, जो अब नर और नारायण के नाम से जाने जाते हैं। इसी वजह से केदारनाथ में मौजूद शिवलिंग तिकोने आकार में है, और ऐसा शिवलिंग बिल्कुल भी आम नहीं है।

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Dr. Kirti Sisodhia

Content Writer

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